बीजापुर की यात्रा : नम्बी झरने तक का सफ़र
सितम्बर का महीना था। उसने मुझे बस्तर के एक नए झरने के बारे में बताया और कहा “किसी दिन हम वहाँ चलेंगे।” मैंने भी मुस्कुराकर हामी भर दी, लेकिन समय की कमी के कारण वो महीना गुजर गया। दीपावली नज़दीक थी, इसलिए मैं घर चला गया। वैसे सच कहूँ तो मुझे त्यौहारों की भीड़-भाड़ से ज़्यादा सुकून देने वाली यात्राएँ पसंद हैं, लेकिन घरवालों का इंतज़ार देख मैं मना नहीं कर सका। बहुत दिनों बाद घर लौटना था। जैसे ही ऑफिस से छुट्टी मिली, मैंने बाइक उठाई और घर के लिए निकल पड़ा। दरअसल, मैं बस से जाना चाहता था, पर कोंडागांव से नारायणपुर को जोड़ने वाली सड़क पर निर्माण कार्य चल रहा था। बारिश के बाद से काम ठप पड़ा था, और सड़क की हालत इतनी ख़राब थी कि बसें उस रास्ते पर बंद थीं। इसलिए मैंने नेशनल हाईवे 30 का रास्ता चुना।
चर्रे मर्रे घाटी की यादें
मेरे घर के रास्ते में अंतागढ़ के पास एक
खूबसूरत जगह पड़ती है चर्रे मर्रे वाटरफॉल। घुमावदार घाटी, पहाड़ों के बीच झरते पानी की आवाज़ और हवा का ठंडा झोंका… ये सब मन को
सुकून देते हैं। मैं वहाँ कई बार जा चुका हूँ, इसलिए इस बार
झरना देखने के बजाय सीधा घर की ओर निकल गया। घर पहुँचने के अगले दिन घर के ज़रूरी
सामान की खरीदारी में दिन निकल गया। दीपावली भी यूँ ही गुजर गई। मैं कुछ दिन और
रुकना चाहता था, पर ऑफिस से कॉल आया और मुझे लौटना पड़ा। शहर
लौटने के बाद पता चला कि किसी कारणवश प्रोटोकॉल बदल गया है। अचानक मेरे मन में
ख्याल आया क्यों न इस खाली समय को एक सफ़र में बदल दूँ?
फिर तय हुआ एक सफ़र
मैंने उसे कॉल किया और सारी बात बताई। पूछा “जो हमने पहले तय किया था, क्या अब उस सफ़र पर निकला जाए?” वो तैयार थी। मैंने कहा “जगह तुम तय करना, मैं तो
कहीं भी चलने को तैयार हूँ।” रात तक हमने जगह तय करने का निश्चय किया, ताकि सुबह 10 बजे तक निकल सकें। रात में खाना खा कर जब
हमारे बिच फ़ोन पर बात हुई तो तय हुआ की हम बीजापुर चलते हैं।” बस, फिर क्या था अगली सुबह हम बीजापुर की यात्रा पर निकल पड़े।
रास्ते की सुंदरता और यादों के निशान
हम भानपुरी से होकर चित्रकोट के रास्ते
बारसूर की ओर बढ़े। बारसूर पहुँचने से पहले एक छोटी नदी आती है, जो मेरी पसंदीदा जगहों में से एक है। वहाँ पहुँचकर मन भारी हो गया वो
जगह अब बाढ़ से बर्बाद हो चुकी थी। यादें तैरने लगीं... उसी नदी के किनारे मैंने
पहली बार उसका हाथ थामा था। वहीं हमने कई तस्वीरें खींचीं थीं हमारी हँसी,
हमारे पल अब सिर्फ़ तस्वीरों में रह गए थे। थोड़ी देर रुककर हमने
कुछ फोटो लीं और आगे निकल पड़े। गीदम पहुँचने से पहले ही हमने एक शॉर्टकट रास्ता
पकड़ लिया, जो सीधे बीजापुर जाने वाले हाईवे से जुड़ता था। सड़क
अच्छी थी बाइक 80–90 की रफ़्तार पर दौड़ रही थी। सुबह से
कुछ नहीं खाया था, इसलिए एक छोटे बाज़ार में रुककर केले
खरीदे। रास्ते में कहीं छाँव देखकर रुक गए, केले खाए और फिर
सफ़र जारी रखा।
बारिश का साथ
सफ़र शानदार था। पहाड़, जंगल और हवा सब कुछ मानो हमारे साथ चल रहे थे। लेकिन थोड़ी देर में
आसमान घिर आया और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। हम पास के एक घर में जा घुसे,
जहाँ पहले से ही कुछ लोग बारिश से बचने के लिए बैठे थे। बारिश थमी
तो फिर से रास्ते पर निकल पड़े, लेकिन थोड़ी ही दूर जाकर फिर
बारिश आ गई। इस बार हमने सड़क किनारे की एक बच्चों का एक सरकारी होस्टल पर शरण ली।
जब बारिश कुछ थमी, तब आगे की यात्रा शुरू की। शाम होते-होते
हम आखिरकार बीजापुर पहुँच गए।
बीजापुर की रात और अगली सुबह की शुरुआत
मैंने अपने एक दोस्त को कॉल किया। वो वहीं रहता है। उसने लोकेशन बताया, लेकिन हम उसके कमरे से एक किलोमीटर आगे निकल गए थे। थोड़ी देर में उसके कमरे में पहुँचे, रात वहीं गुज़री। सुबह की ठंडी हवा और पहाड़ों के बीच उगता सूरज, नई यात्रा का संकेत दे रहा था। आज हमारा गंतव्य था नम्बी वाटरफॉल।
नम्बी झरने की ओर
मैं बाइक धीरे चला रहा था और सड़क के दोनों ओर फैले घने जंगलों को देखते हुए उनकी विशालता और शांति पर बात करते-बात करते हम उसूर पहुँच गए। उसूर से पक्की सड़क शुरू होती है। जैसे ही पक्की सड़क मिली, मन को थोड़ा सुकून मिला। अब बाइक की रफ़्तार 70–80 तक पहुँच चुकी थी। मौसम भी कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। डर था कि कहीं बारिश न हो जाए, क्योंकि हमारे पास बारिश से बचने का कोई इंतज़ाम नहीं था।
ख़ैर, समय रहते हम बीजापुर पहुँच गए। वहाँ बाज़ार सजा हुआ था। कुछ खाने का मन हुआ, तो एक टपरी से चाउमीन पैक करवाई और दोस्त के कमरे की ओर निकल पड़े। कमरे पर पहुँचकर हल्का-फुल्का खाया, सामान समेटा और फिर बीजापुर को अलविदा कहा। असल में हमारा इरादा दंतेवाड़ा जाने का था, लेकिन वहाँ ठहरने की व्यवस्था न होने के कारण हमने बारसूर में रुकने का फ़ैसला किया। अंदाज़ा था कि बारसूर पहुँचते-पहुँचते रात हो जाएगी, इसलिए मुचनार होम स्टे में रुकने का निर्णय लिया।
हम शाम होने से पहले ही बारसूर पहुँच गए। होम स्टे के लोग बिल्कुल घर जैसे लगे। रात को घर जैसा खाना मिला और वहीं रात गुज़ारी। सुबह उठकर पास की नदी की ओर ब्रश करने चले गए। वहाँ का नज़ारा बेहद ख़ूबसूरत था शांत, सुकून देने वाला। वापस लौटकर हम सातधार के सफ़र के लिए निकल पड़े। सातधार का दृश्य मुझे हमेशा से बहुत पसंद है। कुछ देर वहाँ समय बिताने के बाद हम फिर होम स्टे लौट आए। खाना खाया और फिर वापसी की तैयारी की। बीजापुर जाते समय रास्ते में परबत की फसल देखी थी। तभी तय कर लिया था कि लौटते वक्त उसकी तस्वीर ज़रूर लेंगे। वापसी में जब हम उस जगह पहुँचे, तो वहाँ कोई नहीं था। मोबाइल निकाला और तस्वीरें लेने लगे। काफ़ी देर तक वहाँ रुककर उस पल को महसूस करते रहे। इसके बाद हम चित्रकूट की ओर जाने वाले रास्ते पर बढ़े। वैसे हमें चित्रकूट जाना नहीं था, लेकिन हमारी मंज़िल का रास्ता उधर से होकर ही जाता था। पहले ही तय कर लिया था कि इस बार नेशनल हाईवे छोड़कर जंगल के रास्ते से जाएँगे क्योंकि वह रास्ता बेहद ख़ूबसूरत है। और इस तरह, झरनों, जंगलों, कच्ची-पक्की सड़कों और अनगिनत यादों के साथ बीजापुर की यह यात्रा मन में हमेशा के लिए बस गई।






