मैं चाहता हूँ कि वह फिर से बोले, जैसे पहले बोला करती थी।

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अब मुझे ऐसा लगता है कि समय केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं पलटता, वह हमारे भीतर भी बहुत कुछ बदल देता है। खासकर तब, जब हम किसी से प्रेम करने लगते हैं। यहाँ मैं अपनी बात लिख रहा हूँ, अपने दिल की, अपने अनुभव की। क्योंकि जो मैं महसूस कर रहा हूँ, उसे किसी और की कहानी बनाकर नहीं कहा जा सकता।

मैं उसे बहुत चाहता हूँ। इतनी शिद्दत से कि उसकी खामोशी भी मुझे सुनाई देती है। लेकिन यह खामोशी शुरू से नहीं थी। पहले ऐसा नहीं था। एक समय था जब वह हर बात मुझसे साझा करती थी। दिन में क्या हुआ, किस बात पर मन उदास हुआ, किस बात पर वह हँसी सब कुछ। मुझे तब लगता था कि यही तो प्रेम है, जहाँ कुछ भी छुपा नहीं रहता।

मैं चाहता हूँ कि वह हर बात मुझसे कहे। इसलिए नहीं कि मैं सवाल करना चाहता था, बल्कि इसलिए कि मैं उसकी हर समस्या का हल बनना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि जब दो लोग प्रेम में होते हैं, तो एक-दूसरे का सहारा बनना ही सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी होती है। अगर वह दुखी है, परेशान है, उलझी हुई है तो मुझे पता होना चाहिए।

लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा। वह कम बोलने लगी। पहले जो बातें अपने आप निकल आती थीं, अब वे रुकने लगीं हैं। जवाब छोटे हो गए, बातचीत जल्दी खत्म हो जाती हैं। उसके लिए शायद यह सामान्य है। उसका मानना है कि कम बात करना ठीक है, क्योंकि ज़्यादा बातें कई बार नाराज़गी और झगड़े की तरफ ले जाती हैं। वह सोचती है कि चुप रहकर वह रिश्ता बचा रही है।

लेकिन मेरी दुनिया में यह चुप्पी बहुत शोर करने लगी है। मेरे मन में सवाल आने लगे है क्या अब उसे मेरी ज़रूरत नहीं है? क्या वह मुझसे बात नहीं करना चाहती? क्या मैंने कुछ गलत किया? या फिर उसका प्यार पहले जैसा नहीं रहा? ये सवाल दिन-रात मेरे साथ रहने लगे हैं।

मैं बाहर से सामान्य दिखता हूँ। हँसता हूँ, लोगों से बात करता हूँ, अपने काम करता हूँ। लेकिन भीतर ही भीतर मैं टूट रहा हूँ। कई बार अकेले में मेरी आँखें भर आती हैं। मैं रोता हूँ, लेकिन किसी को पता नहीं चलता। मैं अपने आँसू भी अपने अंदर ही दबा लेता हूँ, क्योंकि मुझे डर लगता है कि कहीं मैं कमज़ोर न समझ लिया जाऊँ।

मुझे लगता है कि जब किसी रिश्ते में बातें कम होने लगती हैं, तो वह रिश्ता धीरे-धीरे खत्म होने की ओर बढ़ने लगता है। मेरे लिए बातचीत सिर्फ शब्द नहीं है, यह रिश्ते की साँस है। अगर यह साँस धीमी पड़ जाए, तो रिश्ता घुटने लगता है।

मेरा मानना है कि रिश्ते को ज़िंदा रखने के लिए हर रोज़ नएपन की ज़रूरत होती है। जैसे शुरुआत में हुआ करता था। बिना वजह बातें करना, छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाना, एक-दूसरे को दिनभर याद करना। अगर यह सब धीरे-धीरे खत्म होने लगे, तो प्रेम भी आदत बन जाता है। और आदत अक्सर खामोशी में दम तोड़ देती है।

इसी सोच ने मुझे भीतर से और डरा दिया है। मैं हर पल यही सोचता रहता हूँ कि कहीं यह रिश्ता खात्मे की ओर तो नहीं बढ़ रहा। मैं चाहता हूँ कि वह मुझसे लड़े, शिकायत करे, नाराज़ हो लेकिन चुप न रहे। क्योंकि उसकी चुप्पी में मैं खुद को दोषी मानने लगता हूँ।

कई रातें मैंने यूँ ही जागकर गुज़ारी हैं। मोबाइल हाथ में लेकर सोचता रहता हूँ कि क्या लिखूँ, क्या न लिखूँ। कई बार संदेश टाइप करता हूँ और फिर मिटा देता हूँ। डर लगता है कि कहीं मेरी बातों से वह और दूर न हो जाए।

कभी-कभी मेरा दिल करता है कि मैं कहीं दूर चला जाऊँ। एक ऐसी जगह, जहाँ मेरे सिवा कोई न हो। जहाँ मैं खुलकर रो सकूँ, खुली साँस ले सकूँ, और अपने भीतर के शोर को बाहर निकाल सकूँ। वहाँ मुझे यह साबित नहीं करना पड़े कि मैं मजबूत हूँ।


रवानी सफ़र


मैं नहीं जानता कि वह यह सब समझ पाएगी या नहीं। शायद वह यह नहीं जानती कि उसकी खामोशी मुझे कितना तोड़ रही है। उसके लिए कम बोलना सुरक्षा है, और मेरे लिए वही कम बोलना सबसे बड़ी असुरक्षा बन गया है।

यह लिखते हुए मुझे यह एहसास हो रहा है कि शायद प्रेम में सबसे ज़रूरी चीज़ बोलना है। साफ़ बोलना। सच बोलना। क्योंकि जब शब्द नहीं होते, तब गलतफहमियाँ जगह बना लेती हैं।

मैं यह नहीं कहता कि वह गलत है या मैं सही हूँ। हम दोनों अपने-अपने डर के साथ इस रिश्ते में हैं। बस फर्क इतना है कि वह चुप रहकर बचाना चाहती है, और मैं बोलकर।

यह मेरी कहानी है। मेरी उलझन, मेरा डर, मेरा प्रेम। और शायद इसे लिखने के बाद इतना तो साफ़ है कि मैं अब भी उसे उतना ही चाहता हूँ बस चाहता हूँ कि वह फिर से बोले, जैसे पहले बोला करती थी।

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