अब मुझे ऐसा लगता है कि समय केवल कैलेंडर के पन्ने नहीं पलटता, वह हमारे भीतर भी बहुत कुछ बदल देता है। दिन बीतते जाते हैं और उनके साथ‑साथ जैसे हम खुद से थोड़ा‑थोड़ा दूर होते चले जाते हैं। कभी लगता है कि हम अपनी मानसिक संतुलन की डोर को भी धीरे‑धीरे ढीला छोड़ रहे हैं। बाहर से सब कुछ वैसा ही दिखाई देता है काम, रिश्ते, हँसी, बातचीत लेकिन भीतर कहीं कुछ लगातार खिसक रहा होता है, जैसे रेत मुट्ठी से फिसल रही हो।
पहले ऐसा नहीं था। पहले आँसू आने के लिए कोई ठोस वजह चाहिए होती थी। अब तो यूँ ही बैठे‑बैठे आँखें नम हो जाती हैं। कभी किसी पुरानी बात का ख़याल आ जाता है, कभी किसी अनकहे सवाल की गूँज सुनाई देती है। सोचने की आदत मानो लत बन गई है। दिमाग़ हर समय किसी न किसी उलझन में उलझा रहता है। रात को सोने से पहले और सुबह जागने के बाद भी वही सवाल, मैं उसके लिए वफादार तो हूँ न ? क्यूंकि मेरे वादे, मेरी जिम्मेदारी यही है मेरे जीने के तौर तरीके।
कहने को तो मेरे पास हर रिश्ता है। परिवार है, दोस्त हैं, पहचान के लोग हैं। फोन की स्क्रीन पर नामों की एक लंबी सूची है, जिनमें से किसी को भी कॉल किया जा सकता है। लेकिन फिर भी एक अजीब‑सा खालीपन है, जिसे कोई आवाज़, कोई संदेश, कोई मुलाक़ात भर नहीं पाती। भीड़ में होने के बावजूद अकेलापन महसूस करना शायद सबसे भारी एहसास होता है। यह ऐसा अकेलापन है, जिसमें इंसान खुद को भीड़ के बीच खोया हुआ पाता है।
कई बार लगता है कि जैसे मेरा सब कुछ छिन गया हो। जो चीज़ें कभी खुशी देती थीं, अब उनमें मन नहीं लगता। वही गाने, वही फिल्में, वही पसंदीदा जगहें सब जैसे बेरंग हो गई हों। मोबाइल हाथ में लेकर घंटों यूँ ही बैठे रहना, यह सोचते रहना कि क्या करना है, लेकिन कुछ भी करने का मन न होना। दिल करता है कहीं दूर चला जाऊँ, इतनी दूर कि कोई पहचान न सके, कोई सवाल न पूछे।
कभी‑कभी मैं खुद से पूछता हूँ क्या यह थकान है, या हार? क्या यह अकेलापन है, या खुद से भागने की कोशिश? जवाब साफ़ नहीं मिलते। बस एक भारीपन है, जो हर सुबह साथ उठता है और हर रात साथ सो जाता है। बाहर की दुनिया को मेरी इस हालत का अंदाज़ा भी नहीं होता। सब मुझे सामान्य समझते हैं, क्योंकि मैं मुस्कुराना जानता हूँ।
मुस्कुराना भी एक कला है, जिसे हम समय के साथ सीख लेते हैं। यह मुस्कान दूसरों को भरोसा देती है कि हम ठीक हैं। लेकिन कोई यह नहीं देख पाता कि इस मुस्कान के पीछे कितनी बेचैनी छिपी है। कितनी बार मन करता है कि किसी से कह दूँ आज बहुत थक गया हूँ, आज संभल नहीं पा रहा हूँ। लेकिन फिर वही डर कहीं कोई समझ न पाए तो?
इसी डर के कारण हम चुप रहना चुनते हैं। चुप्पी हमारी ढाल बन जाती है। हम खुद को समझा लेते हैं कि यह सब अस्थायी है, गुजर जाएगा। लेकिन जब यह गुजरने का नाम नहीं लेता, तब एहसास होता है कि यह केवल समय की बात नहीं, यह भीतर की लड़ाई है। एक ऐसी लड़ाई, जिसमें दुश्मन भी हम खुद होते हैं और घायल भी।
मुझे एक ऐसी जगह की तलाश है, जहाँ मेरे सिवा कोई न हो। जहाँ मैं खुली साँस ले सकूँ, बिना यह सोचे कि कोई क्या सोचेगा। जहाँ मैं खुलकर रो सकूँ, बिना किसी सफ़ाई के। जहाँ मैं चिल्ला सकूँ, अपने भीतर के शोर को बाहर निकाल सकूँ। ऐसी जगह जहाँ मुझे मजबूत दिखने की ज़रूरत न हो।
शायद वह जगह कोई पहाड़ हो, जहाँ हवा मेरे चेहरे से टकराकर मेरे आँसू सुखा दे। या कोई नदी का किनारा, जहाँ बहता पानी मुझे यह याद दिला दे कि रुकना ही दुख का कारण है। या फिर कोई छोटा‑सा कमरा, जहाँ सिर्फ़ एक खिड़की हो और ढेर सारी खामोशी।
उस जगह मैं खुद से मिलना चाहता हूँ। उस खुद से, जो कभी बहुत सपने देखा करता था। जो छोटी‑छोटी बातों पर खुश हो जाता था। जो हर दिन को एक नए मौके की तरह देखता था। शायद उसी खुद को मैंने कहीं पीछे छोड़ दिया है, जिम्मेदारियों, उम्मीदों और अपेक्षाओं के बोझ तले।
हम सब कहीं न कहीं बहुत मजबूत बनने की कोशिश में बहुत अकेले हो गए हैं। हमें सिखाया गया कि रोना कमजोरी है, थक जाना गलत है। लेकिन सच यह है कि इंसान होना ही इन सबका नाम है। थकना, टूटना, रुकना यह सब हमारी यात्रा का हिस्सा हैं।
जब मैं इन बातों को लिखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि शब्द भी एक सहारा हो सकते हैं। वे सुनते हैं, बिना जज किए। शायद इसीलिए कुछ लोग लिखते हैं, कुछ गाते हैं, कुछ चुपचाप आसमान को देखते हैं। हर कोई अपने तरीके से खुद को बचाने की कोशिश करता है।
मुझे नहीं पता कि यह बेचैनी कब खत्म होगी। शायद कभी नहीं, शायद बहुत जल्दी। लेकिन अब मैं यह जानने लगा हूँ कि अकेलापन कोई दुश्मन नहीं है। यह एक इशारा है कि हमें खुद की तरफ़ देखने की ज़रूरत है। अपने दर्द को समझने, स्वीकार करने की ज़रूरत है।
शायद एक दिन मैं उस जगह पहुँच जाऊँगा, जहाँ मेरे सिवा कोई न हो। और वहाँ मैं खुद से कहूँगा तुम थके हो, और यह ठीक है। तुम टूटे हो, और यह भी ठीक है। क्योंकि यहीं से शायद दोबारा जुड़ने की शुरुआत होगी। खुद से, ज़िंदगी से, और उम्मीद से।
