शायद ये बात मैं सामने से कभी ठीक से कह नहीं पाता, इसलिए लिख रहा हूँ।
तुम्हारा वो पहला मैसेज “जो समझना है समझो, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है” सिर्फ एक लाइन नहीं था, वो मेरे दिल पर जैसे अचानक गिरा हुआ कोई भारी पत्थर था। उस पल मैं समझ ही नहीं पाया कि इसे कैसे लूं। शब्द छोटे थे, लेकिन उनका असर बहुत गहरा था। ऐसा लगा जैसे मेरे लिए जो मायने थे, वो एक झटके में हल्के हो गए हों।
और फिर… पता ही नहीं चला कब आँखों से आँसू निकलने लगे। वो कोई हल्की-सी नमी नहीं थी, वो ऐसा था जैसे दिल का बोझ सीधे आँखों के रास्ते बाहर आ रहा हो। मैं बस लेटा रहा… और आँसू अपने आप गिरते रहे। हर बूंद के साथ एक सवाल था, एक दर्द था, एक उलझन थी क्या मैं तुम्हारे लिए उतना मायने नहीं रखता, जितना तुम मेरे लिए रखती हो?
मैंने बार-बार उस मैसेज को पढ़ा… हर बार वही सवाल मन में आता रहा क्या सच में तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता? क्या जो कुछ मैं महसूस करता हूँ, उसकी कोई अहमियत नहीं है? उस एक लाइन ने जैसे मेरे अंदर कई अनकहे डर जगा दिए। दिल की धड़कन अचानक तेज हो गई, जैसे कुछ छूट रहा हो… जैसे कुछ टूट रहा हो, जिसे मैं पकड़कर रखना चाहता था।
उस पल मैं कुछ भी सोचने की हालत में नहीं था। बस इतना महसूस हो रहा था कि जो रिश्ता मेरे लिए खास है, कहीं वो धीरे-धीरे मेरी पकड़ से फिसल तो नहीं रहा। और शायद सबसे ज्यादा दर्द इस बात का था कि मैं समझ ही नहीं पा रहा था आखिर ऐसा क्या हुआ कि तुमने इतनी बेरुखी से ये कह दिया कि “जो समझना है समझो…”
फिर कुछ देर बाद तुम्हारा दूसरा मैसेज आया “अगर आपको अच्छा नहीं लगा तो really sorry…”
मैं उसे पढ़कर और ज्यादा उलझ गया। क्योंकि उस वक्त तक मैं अंदर से टूट चुका था। मेरे आँसू रुक चुके थे, लेकिन दिल में जो भारीपन था, वो वहीं का वहीं था।
मुझे समझ नहीं आया कि इस “sorry” को कैसे लूं। क्योंकि जब दर्द अपने चरम पर पहुंच चुका हो, तब एक साधारण “sorry” उस गहराई को छू भी नहीं पाता। ऐसा लगा जैसे जो महसूस मैंने किया, जो टूटा मेरे अंदर… उसका कोई सही अर्थ इस माफी में नहीं है।
मैं ये नहीं कहता कि तुम्हारा इरादा मुझे चोट पहुंचाने का था। शायद तुम उस वक्त अपने किसी और मूड में थी, या तुम्हारे मन में कुछ और चल रहा था जिसे तुम कहना नहीं चाहती थी। लेकिन जो भी था, उस एक लाइन ने मेरे अंदर एक ऐसी याद छोड़ दी है, जो शायद जल्दी नहीं जाएगी।
अब जब भी वो शब्द याद आएंगे “जो समझना है समझो…” तो उसके साथ वही पल, वही आँसू, वही दर्द फिर से महसूस होगा। और यही डर लगता है कि कहीं ये छोटी-सी बात हमारे रिश्ते में एक ऐसा निशान न बन जाए, जो हर बार याद दिलाए कि कभी कुछ टूट गया था।
मैं बस इतना चाहता हूँ कि हम दोनों के बीच बातें अधूरी न रहें। अगर तुम्हारे मन में कुछ भी हो चाहे छोटा हो या बड़ा तो उसे ऐसे शब्दों में मत छोड़ो जो सामने वाले को अंदर तक हिला दें। क्योंकि कभी-कभी हम जो casually कह देते हैं, वो सामने वाले के लिए बहुत गहरा बन जाता है।
मेरे लिए ये रिश्ता सिर्फ बातों का नहीं है, एहसासों का है। मैं तुम्हारे साथ हर वो चीज शेयर करना चाहता हूँ जो तुम्हें खुश करे, और हर वो चीज भी समझना चाहता हूँ जो तुम्हें परेशान करे। मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहना चाहता हूँ सिर्फ अच्छे समय में नहीं, बल्कि उन पलों में भी जब शब्द कम पड़ जाते हैं।
शायद मैं ज्यादा सोचता हूँ, शायद ज्यादा महसूस करता हूँ… लेकिन यही मेरा तरीका है किसी को अपना मानने का। और जब अपने से जुड़े शब्द ऐसे मिलते हैं, तो दिल खुद-ब-खुद संवेदनशील हो जाता है।
मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा… बस अपने दिल की बात बता रहा हूँ। ताकि तुम समझ सको कि उस एक मैसेज ने मेरे अंदर क्या महसूस करवाया। और शायद आगे हम दोनों इस बात का ख्याल रख सकें कि हमारे शब्द, हमारे रिश्ते को और मजबूत बनाएं… न कि उसे अनजाने में चोट पहुंचाएं।
क्योंकि सच कहूं…
तुम मेरे लिए मायने रखती हो, बहुत ज्यादा।
और शायद इसी वजह से, तुम्हारे शब्द भी मेरे दिल पर उतनी ही गहराई से असर करते हैं।”