खामोशी और बदलते रिश्ते

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कभी-कभी जिंदगी में हम किसी रिश्ते को बहुत सच्चाई से निभाना चाहते हैं। हम अपनी व्यस्तता, अपनी थकान, अपने काम के बीच से भी उस इंसान के लिए थोड़ा समय निकाल लेते हैं। क्योंकि हमारे लिए वह रिश्ता सिर्फ़ एक बातचीत नहीं होता, वह हमारे दिन का एक अहम हिस्सा होता है।




जिंदगी में काम बहुत है, जिम्मेदारियाँ भी हैं। दिन भर कई कामों में उलझा रहता हूँ। लेकिन इन सबके बीच जब भी थोड़ा समय मिलता है, मन सबसे पहले उसी इंसान के पास जाना चाहता है। कई बार मैं अपने काम के बीच से समय निकालकर उसे कॉल मैसेज करता हूँ। कभी बस उसकी आवाज सुनने के लिए, कभी यह पूछने के लिए कि वह कैसा है।

लेकिन अक्सर कॉल उठाया नहीं जाता, न ही मैसेज का जवाब दिया जाता है।

“कैसी हो?”
“सब ठीक है?”

और फिर इंतज़ार शुरू हो जाता है।

कभी-कभी घंटों बाद जवाब आता है।
और जब जवाब आता भी है तो बस इतना
“हाँ।”
“ठीक हूँ।”

कभी-कभी तो जवाब भी नहीं आता।

ऐसे छोटे-छोटे जवाबों में बातचीत खत्म हो जाती है। शब्द तो होते हैं, लेकिन उनमें वह अपनापन नहीं होता जो कभी हुआ करता था।

मैं यह नहीं कहता कि हर समय बात करना जरूरी है। हर किसी की अपनी जिंदगी होती है, अपने काम होते हैं, अपनी परेशानियाँ होती हैं। लेकिन जब कोई इंसान हमारी जिंदगी में सच में मायने रखता है, तो हम उसके लिए कहीं न कहीं से थोड़ा समय निकाल ही लेते हैं।

कई बार मैं खुद से सवाल करता हूँ
क्या सच में वह इतनी व्यस्त है? या फिर अब उसे मुझसे बात करने की उतनी जरूरत महसूस नहीं होती?

यह सवाल मेरे मन में कई बार आता है।

क्योंकि अगर कोई इंसान कभी-कभी देर से जवाब दे, तो वह सामान्य बात है। जिंदगी में ऐसा होता है। लेकिन जब जवाब हमेशा देर से आने लगे, या सिर्फ़ औपचारिक जवाब आने लगे, तो दिल कहीं न कहीं यह महसूस करने लगता है कि कुछ बदल गया है।

कभी-कभी देर से जवाब देने का मतलब सिर्फ़ व्यस्तता भी हो सकता है।
लेकिन कई बार यह भी हो सकता है कि वह इंसान धीरे-धीरे दूरी बना रहा हो।

कभी-कभी लोग सीधे यह नहीं कह पाते कि वे अब पहले जैसा रिश्ता नहीं चाहते।
इसलिए वे धीरे-धीरे जवाब देना कम कर देते हैं, बातचीत छोटी कर देते हैं, और अपने आप दूरी बना लेते हैं।

शायद यह उनका तरीका होता है यह बताने का कि उनके दिल में अब पहले जैसी जगह नहीं रही। यह स्वीकार करना आसान नहीं होता। क्योंकि जब हम किसी रिश्ते को दिल से निभा रहे होते हैं, तो हमें उम्मीद होती है कि सामने वाला भी उतनी ही सच्चाई से रिश्ते को निभाएगा।

सुबह जब नींद खुलती है, तो सबसे पहले वही ख्याल आता है। इस लिए हर रोज दिन की शुरुआत “सुप्रभात” लिख कर करता हूँ, यह सोच कर की उसे एक खूबसूरत दिन मिले। हाल-चाल पूछता हूँ, क्यूंकि मुझे उसका ध्यान रखना है। पर जवाब में सिर्फ गुड मोर्निग और हाँ के अलावा और कुछ नहीं आता है। 

रिश्ते सिर्फ़ चाहने से नहीं चलते, उन्हें निभाने के लिए दोनों का साथ जरूरी होता है। अगर एक व्यक्ति लगातार कोशिश करता रहे और दूसरा व्यक्ति धीरे-धीरे दूर होता जाए, तो वह रिश्ता थकने लगता है। मैं यह नहीं कह सकता कि वह सच में दूर जाना चाहती है या नहीं। क्योंकि बिना पूछे किसी के दिल की बात समझना आसान नहीं होता। लेकिन इतना जरूर महसूस होता है कि पहले जैसी गर्माहट अब उस बातचीत में नहीं रही। और शायद यही बात दिल को सबसे ज्यादा परेशान करती है।

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